जगजीत सिंह का ये मशहूर गजल, छत्तीसगढ़ के राजनीतिज्ञों और नौकरशाहों के लिए मौजू है। अब देखिए न, दिसंबर 2023 में जब सरकार बदली थी तो लोग दावे कर रहे थे, मुख्य सचिव अमिताभ जैन को हटाकर रेवेन्यू बोर्ड का चेयरमैन बनाया जा रहा है। मगर अमिताभ, पूरे अमिताभ निकले। उन्होंने बचा डेढ़ साल कंप्लीट किया। और अब? रेखाओं का खेल देखिए, जिन अफसरों की नए सीएस बनने की अटकलें थी, उन्हें अब रेवेन्यू बोर्ड में दिन गुजारना पड़ेगा। जाहिर है, ब्यूरोक्रेसी में इससे पहले बीकेएस रे, पी राघवन, बीके कपूर, नारायण सिंह और सीके खेतान जैसे आईएएस रेखाओं से मात खा चुके हैं। इसी तरह राजनीति में भी…। रेखाओं के फेर में दिलीप सिंह जूदेव रमन सिंह से पिछड़ गए। वरना, ट्रेप कांड नहीं हुआ होता तो हो सकता था कि जूदेव सीएम बने होते। टीएस सिंहदेव का तो ताजा उदाहरण है। रेखाओं के मारे टीएस बंद कमरे में सिर्फ तीन लोगों के बीच भी ये नहीं कह सके कि मेरी उम्र हो रही है…मुझे पहले मौका दे दिया जाए। जाहिर है, वे इतना भर बोल गए होते तो छत्तीसगढ़ की राजनीति आज अलग दिशा में होती। मगर रेखाएं भूपेश बघेल की हथेली में थीं। इसी तरह सांसद के बाद हवाई जहाज के टेकऑफ की तरह प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी तक पहुंचने वाले अरुण साव ने कभी कहां सोचा था कि बगीया गांव से विष्णुदेव साय आ जाएंगे। 15 साल सीएम की कुर्सी पर बैठ चुके डॉ. रमन सिंह भी कम उम्मीद से थोड़े थे। मगर इस बार मुकद्दर ने साथ नहीं दिया। टंकराम वर्मा तथा श्याम बिहारी जायसवाल मंत्री बनेंगे और बृजमोहन अग्रवाल, अमर अग्रवाल, अजय चंद्राकर, राजेश मूणत मंत्रिमंडल से बाहर बैठेंगे, ये भी कहां किसी ने सोचा था? जगजीत सिंह की गजल की पंक्तियां सही इन सभी पर सही बैठती है…रेखाओं का खेल है मुकद्दर….रेखाओं से मात खा रहे हो…।

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