कोरबा। नगर निगम की राजनीति इन दिनों एक दिलचस्प मोड़ पर खड़ी नजर आ रही है। आमतौर पर जहां विपक्ष सीधे महापौर को घेरता रहा है, वहीं इस बार तस्वीर कुछ अलग दिख रही है। शहर में हो रहे विभिन्न मुद्दों और विरोध प्रदर्शनों में लगातार आयुक्त को निशाने पर लिया जा रहा है, जबकि महापौर लगभग इन हमलों से दूर नजर आ रहे हैं।
हाल ही में बुधवारी क्षेत्र में नाली निर्माण को लेकर विरोध, इतवारी बाजार में शौचालय शुरू न होने का मामला, सड़क और बिजली जैसी समस्याओं को लेकर विपक्ष ने मोर्चा खोला। लेकिन इन सभी मुद्दों में एक बात समान रही—हर बार सवालों के घेरे में आयुक्त ही रहे।
राजनीतिक जानकारों की मानें तो यह कोई सामान्य घटनाक्रम नहीं है। इसके पीछे या तो सोची-समझी रणनीति है या फिर राजनीतिक समीकरणों का बदलाव। कुछ लोगों का मानना है कि विपक्ष जानबूझकर महापौर को सीधे निशाने पर नहीं ले रहा, ताकि टकराव से बचा जा सके। वहीं दूसरी ओर यह भी चर्चा है कि प्रशासनिक फैसलों को आधार बनाकर आयुक्त को घेरना विपक्ष के लिए आसान और प्रभावी तरीका बन गया है।
शहर की सियासी गलियों में यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि क्या यह केवल रणनीतिक चाल है या फिर अंदरखाने कोई नई समझदारी काम कर रही है। क्या महापौर को बचाकर विपक्ष अपनी राजनीति साध रहा है, या फिर यह मजबूरी है?
फिलहाल, कोरबा की राजनीति में यह “अलग रिश्ता” चर्चा का विषय बन चुका है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह समीकरण किस दिशा में जाता है—रणनीति साबित होता है या फिर किसी बड़े राजनीतिक बदलाव का संकेत देता है।

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