सरकार सौर ऊर्जा को बढ़ावा देने के बड़े-बड़े दावे कर रही है, लेकिन ज़मीनी हकीकत में उपभोक्ता जीनेस कंपनी की तकनीकी लापरवाही का खामियाजा भुगतने को मजबूर हैं। घरों में सोलर पैनल लगने के बाद भी उपभोक्ताओं को बिजली बिल में कोई राहत नहीं मिल रही—उल्टा पुराने तरीके से भारी-भरकम बिल थमाए जा रहे हैं।
असल समस्या स्मार्ट मीटर की नेट मीटरिंग (इम्पोर्ट-एक्सपोर्ट) सेटिंग से जुड़ी है। नियमों के मुताबिक मीटर लगते ही या अधिकतम 2–3 दिनों के भीतर एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट सेटिंग सक्रिय हो जानी चाहिए, ताकि उपभोक्ता द्वारा उत्पादित सौर बिजली का लाभ मिल सके। लेकिन जीनेस कंपनी के मीटर लगने के 20–30 दिन बाद भी सेटिंग अपडेट नहीं हो रही, नतीजा—उपभोक्ता अपनी ही बनाई बिजली का लाभ नहीं ले पा रहे।
शिकायत लेकर जब उपभोक्ता बिजली विभाग पहुंचते हैं तो अधिकारी हाथ खड़े कर देते हैं—कहते हैं मीटर जीनेस का है, सेटिंग उन्हीं के पास है। उधर जीनेस कंपनी के प्रतिनिधि कॉल सेंटर और शिकायतों पर कुंडली मारकर बैठे हैं। इस खींचतान में सैकड़ों उपभोक्ता फंसे हैं, न सुनवाई है, न समाधान।
यह हालात सरकार की सौर नीति पर भी सवाल खड़े करते हैं। एक ओर हर घर सोलर का सपना, दूसरी ओर स्मार्ट मीटर की बदहाली। जीनेस कंपनी की खराब कार्यप्रणाली और तकनीकी सुस्ती ने उपभोक्ताओं को अधर में लटका दिया है—जहां न सोलर का लाभ मिल रहा है, न बिजली बिल से राहत।
हालांकि साई प्रोजेक्ट को इस समस्या से अवगत करा दिया गया है और जल्द निराकरण का आश्वासन दिया गया है, लेकिन सवाल यही है—आख़िर कब तक उपभोक्ता इंतज़ार करे?
जब तक जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक “सोलर से शून्य बिल” का सपना सिर्फ़ काग़ज़ों में ही सिमटा रहेगा।

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