बिलासपुर में सोमवार को आयोजित नगर निकाय का कार्यक्रम उस वक्त कागज़ों से पहले ज़मीन पर ढह गया, जब केंद्रीय राज्य मंत्री तोखन साहू का नाम प्रोटोकॉल सूची में नहीं पाया गया। नतीजा यह हुआ कि जनता मौजूद थी, मंच सजा था, लेकिन कार्यक्रम नाम की गलती में रद्द कर दिया गया।
बताया जा रहा है कि बिलासपुर सांसद होने के बावजूद तोखन साहू को अतिथियों की सूची से बाहर रखा गया। विधायक अमर अग्रवाल भी इस पूरे घटनाक्रम में मौन साधे रहे। इससे पहले युवा महोत्सव में भी तोखन साहू का नाम प्रोटोकॉल के अनुसार नहीं लिखा गया था, जिससे यह साफ हो गया कि यह चूक संयोग नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही की श्रृंखला है।
दिल्ली से संदेश पहले ही स्पष्ट है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तोखन साहू को अपने मंत्रिमंडल में शामिल कर यह जता दिया कि संगठन और सरकार में उनका कद क्या है। इसके बावजूद स्थानीय स्तर पर उन्हें नजरअंदाज करना अफसरों के लिए महंगा सौदा बन गया।
राजनीतिक समीकरण और भी दिलचस्प हैं। डिप्टी सीएम अरुण साव और तोखन साहू एक ही विधानसभा क्षेत्र और राजनीतिक पृष्ठभूमि से आते हैं, लेकिन प्रोटोकॉल में केंद्रीय राज्य मंत्री का स्थान राज्य के मंत्री से ऊपर होता है—यह नियम किताबों में ही नहीं, सियासत में भी लिखा है।
अब हाल यह है कि बिलासपुर के अधिकारी अंदर ही अंदर पिस रहे हैं। नेहरू चौक पर सरकारी आवास अलॉटमेंट से लेकर कार्यक्रमों की सूची तक, हर फाइल में एक ही सवाल गूंज रहा है—नाम किसका ऊपर जाएगा?
क्योंकि अब संदेश साफ है—
तोखन साहू का नाम अगर सूची में नहीं होगा,
तो कार्यक्रम का नामोनिशान भी नहीं बचेगा।
और अगर नाराज़गी फूटेगी,
तो उसका पहला शिकार नेता नहीं,
अफसर ही बनेंगे।

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