कोरबा – जनदर्शन – सेवा, संवेदना और समाधान के दावे सोशल मीडिया पर रोज़ाना किए जा रहे हैं, लेकिन कोरबा शहर की हकीकत इन दावों को आईना दिखा रही है। मंत्री लखन लाल देवांगन के जनदर्शन की तस्वीरों के ठीक उलट, पूरा शहर अंधेरे, धुएँ और अव्यवस्था में डूबा हुआ है।
शहर की अधिकांश स्ट्रीट लाइटें बंद पड़ी हैं। शाम होते ही मोहल्लों में अंधेरा छा जाता है, जिससे अपराध और दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ गया है। जनता पूछ रही है—अगर रोज़ जनदर्शन हो रहा है, तो शहर अब भी अंधेरे में क्यों है?
प्रदूषण की स्थिति और भी भयावह है। हालात ऐसे हैं कि शाम 7 बजे के बाद कोरबा के मोहल्लों में निकलना मुश्किल हो जाता है। चारों ओर धुआँ ही धुआँ फैला रहता है, लेकिन न कोई चेतावनी, न कोई ठोस कार्रवाई दिखाई देती है।
यातायात व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है। जाम अब अपवाद नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की सच्चाई बन चुका है। वहीं सड़कें इस कदर जर्जर हैं कि सड़क कम, गड्ढे ज्यादा नजर आते हैं, जिससे वाहन चालकों और राहगीरों की जान हर दिन जोखिम में रहती है।

स्थानीय नागरिकों का कहना है कि जनदर्शन में आवेदन देने के बाद सिर्फ “निर्देश दिए गए” का जवाब मिलता है, लेकिन समस्या वहीं की वहीं बनी रहती है। समाधान फाइलों में कैद होकर रह जाता है।
अब सवाल सीधा है—
क्या जनदर्शन जनता के लिए है या सिर्फ सोशल मीडिया की शोभा बढ़ाने के लिए?
जब शहर अंधेरे, धुएँ, जाम और गड्ढों में डूबा है, तब सेवा और संवेदना के दावे खोखले नजर आते हैं।


