कोरबा – छत्तीसगढ़ की राजनीति में दशकों से केंद्र में रहे नेता प्रतिपक्ष चरणदास महंत भले ही बेटे सूरज महंत के राजनीतिक प्रवेश को “मीडिया की कल्पना” बता रहे हों, लेकिन ज़मीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट नज़र आ रही है।
हर दौरे, हर बैठक और हर मंच पर सूरज की मौजूदगी यह सवाल खड़ा कर रही है—क्या यह सिर्फ बुज़ुर्ग माता-पिता का सहारा है, या सत्ता की विरासत सौंपने की तैयारी?
डॉ. महंत का यह कहना कि “हमें भी इस उम्र में घूमने के लिए सहारे की ज़रूरत होती है” सियासत में मासूम बयान नहीं माना जा रहा। क्योंकि वही ‘सहारा’ आज राजनीति के दांव-पेच सीख रहा है, नेताओं से मिल रहा है, संगठन को करीब से देख रहा है। इसे संयोग कहें या पूर्व नियोजित राजनीतिक प्रशिक्षण?
सांसद ज्योत्सना महंत के साथ भी सूरज की सक्रियता लगातार बढ़ रही है। समर्थकों की दबी-जुबान मांग है कि अगला विधानसभा या लोकसभा चुनाव सूरज के लिए “उपयुक्त समय” हो सकता है। यानी सार्वजनिक इनकार के बावजूद, अंदरखाने टिकट की जमीन तैयार की जा रही है।
यही वह बिंदु है जहाँ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस फिर कटघरे में खड़ी है। पार्टी दशकों से परिवारवाद से बाहर निकलने की बात करती रही है, लेकिन ज़मीनी कार्यकर्ताओं का सवाल आज भी वही है—
👉 क्या कांग्रेस में मेहनत, संघर्ष और निष्ठा का कोई मोल नहीं?
👉 क्या टिकट सिर्फ नेताओं के बेटों के लिए आरक्षित हैं?
जो कार्यकर्ता सालों से झंडा ढो रहे हैं, आंदोलन झेल रहे हैं, सत्ता से दूर रहकर संगठन जिंदा रखे हुए हैं—उनके लिए संदेश साफ़ है:
लाइन में खड़े रहो, फैसला ऊपर से होगा।
आज ‘सहारा’ कहा जा रहा है, कल ‘जरूरत’ बताई जाएगी और परसों ‘परिस्थिति’ के नाम पर मैदान में उतार दिया जाएगा। सवाल सिर्फ सूरज महंत का नहीं है—
सवाल है कांग्रेस की नीयत का, और उस कार्यकर्ता के भविष्य का, जिसे हर चुनाव से पहले सिर्फ ताली बजाने के लिए बुलाया जाता है।

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