पूरी किताब लो या खाली जाओ—दुकानदारों की दबंगई, शिक्षा विभाग मौन”

कोरबा। शिक्षा के नाम पर खुलेआम व्यापार का खेल अब शहर में तेज होता जा रहा है। एक तरफ सरकार बच्चों को सस्ती और सुलभ शिक्षा देने के बड़े-बड़े दावे करती है, वहीं दूसरी ओर कोरबा की कुछ बुक दुकानों में अभिभावकों को जबरन पूरा “बुक सेट” खरीदने के लिए मजबूर किया जा रहा है।
स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि यदि कोई अभिभावक अपने बच्चे के लिए केवल एक या दो जरूरी किताबें खरीदने दुकान पर पहुंचता है, तो उसे साफ तौर पर मना कर दिया जाता है। दुकानदारों का दो टूक जवाब होता है—
👉 “बुक लेंगे तो पूरा सेट लेना पड़ेगा, वरना कुछ नहीं मिलेगा।”
यह रवैया उन परिवारों के लिए सबसे ज्यादा परेशानी का कारण बन रहा है, जिनके पास पहले से कुछ किताबें मौजूद हैं। बावजूद इसके, उन्हें मजबूरी में हजारों रुपये खर्च कर पूरा सेट खरीदना पड़ रहा है।
💸 आर्थिक शोषण का आरोप
मध्यम और गरीब वर्ग के अभिभावकों का कहना है—
👉 “जब हमारे पास आधी किताबें पहले से हैं, तो हम दोबारा पूरा सेट क्यों खरीदें?”
यह सवाल अब सिर्फ परेशानी नहीं, बल्कि सीधे-सीधे आर्थिक शोषण की ओर इशारा कर रहा है।

❗ नियम ताक पर, विभाग खामोश

नियम साफ कहते हैं कि कोई भी दुकानदार ग्राहक को पूरी सामग्री खरीदने के लिए बाध्य नहीं कर सकता। इसके बावजूद कोरबा में यह नियम केवल कागजों तक सीमित नजर आ रहा है।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि यह पूरा खेल शिक्षा विभाग की नाक के नीचे चल रहा है, लेकिन अब तक किसी तरह की ठोस कार्रवाई नहीं हुई है।

🚨 बड़ा सवाल

क्या प्रशासन इस खुली मनमानी पर लगाम लगाएगा?
या फिर शिक्षा के नाम पर यह “बुक माफिया मॉडल” यूं ही चलता रहेगा?

 

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