कोरबा के पुराने बस स्टैंड के आसपास कभी एक नाम बड़ा चर्चित हुआ करता था — भाऊ। उस दौर में जब कांग्रेस की सरकार थी, तब इलाके में सूरज, मोती और श्री देवी नाम से लॉटरी का खेल खूब चलता था। कहते हैं उस खेल में किस्मत कम और भाऊ की पहचान ज्यादा चलती थी।
जिले के कई लोग आज भी उस दौर को याद करते हैं, जब पुराने बस स्टैंड के आसपास लॉटरी की पर्चियां और किस्मत के सपने दोनों बिकते थे। वक्त बदला, सरकार बदली और लॉटरी का खेल भी धीरे-धीरे बंद हो गया।
अब हालात यह हैं कि वही भाऊ आजकल पुरानी गाड़ियों की खरीदी-बिक्री कर अपना काम चला रहे हैं। मगर दिल के किसी कोने में शायद अभी भी पुराने दिन और कांग्रेस का जमाना ताजा है।
मजेदार बात यह भी है कि भाऊ खुद को एक जनप्रतिनिधि का घोषित प्रतिनिधि भी बताते हैं, लेकिन आसपास के लोग मजाक में कहते हैं —
“भाऊ की किस्मत भी गाड़ी की तरह है… कभी लॉटरी की रफ्तार, तो कभी सेकेंड हैंड स्पीड।”
अब कोरबा के चौराहों पर लोग हंसते हुए कहते नजर आते हैं —
“लॉटरी का जमाना गया… अब गाड़ियों के नंबर में ही किस्मत ढूंढो!” 😄

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