पुलिसिंग में फिटनेस सबसे ज़रूरी मानी जाती है, लेकिन हकीकत ये है कि किसी की तोंद पैंडल से बाहर झाँक रही है तो किसी को गुटखा–सिगरेट की ऐसी लत कि वर्दी से ज़्यादा सुगंध उन्हीं की आती है। ऐसे में जब पुलिसकर्मी ही अनफिट होंगे तो जनता भी यही पूछेगी—“भाई, फिट पुलिसिंग करोगे कैसे?”

इसी सवाल का जवाब खोजने सरगुज़ा संभाग में अनफिट पुलिसकर्मियों को फिट करने की एक अनोखी मुहिम शुरू की गई है। सुबह 4 बजे उठकर मैदान में पसीना बहाते दिखने वाले किसी नए रिक्रूट नहीं, बल्कि वही पुलिसकर्मी हैं जो सालों से विभाग में सेवा दे रहे हैं—आरक्षक, प्रधान आरक्षक से लेकर टीआई तक।

आईजी दीपक झा ने पूरे संभाग में डेटा तैयार किया जिसमें पता चला कि करीब 300 से ज्यादा पुलिसकर्मी फिटनेस और व्यसन की समस्या से जूझ रहे हैं। इसके बाद इन्हें 50–50 के बैच में CRPF ट्रेनिंग सेंटर भेजा जा रहा है, जहाँ इनकी तोंद कम करने से लेकर आदतें सुधारने तक का स्पेशल ऑपरेशन चल रहा है।

आईजी का कहना है कि यह कोई सज़ा नहीं, बल्कि “जीवन जीने की कला” सिखाने का अभियान है—ताकि पुलिस वाले खुद फिट रहें, परिवार खुश रहे और ड्यूटी भी दमदार हो।

ट्रेनिंग में पुलिसकर्मियों को कड़ा शारीरिक व्यायाम, योगा, ध्यान और सख्त डाइट दी जा रही है। हफ्ते में सिर्फ एक दिन छुट्टी—बाकी दिन वर्दी नहीं, पसीना बहाने का ड्रेस कोड लागू। नतीजे भी दिख रहे हैं—कई पुलिसकर्मी 4–5 किलो हल्के और 4–5 साल युवा महसूस कर रहे हैं।

अब जनता की उम्मीद भी बढ़ गई है—“चलो, अगर पेट अंदर होगा… तो शायद पुलिसिंग भी बाहर आएगी!”

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