छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में स्थित माता धूमावती का प्रसिद्ध मंदिर, जिसे ‘चिट्ठी वाली माता’ के नाम से भी जाना जाता है, श्रद्धालुओं के बीच विशेष मान्यता रखता है. कहा जाता है कि जो भी भक्त सच्चे मन से अपनी मनोकामनाओं को चिट्ठी के माध्यम से माता के चरणों में अर्पित करता है, उसकी हर इच्छा पूरी होती है. इस मंदिर का माहात्म्य पूरे भारत में प्रसिद्ध है, और यहां साल भर भक्तों की भीड़ लगी रहती है.
मनोकामना होती है पूरी
दर्शन करने पहुंची महिला जयश्री लोकल 18 से बात करते हुए कहती हैं कि वे तीन सालों से दतिया माता मंदिर में हर शनिवार को आती हैं. कोई भी मनोकामना हो तो पूरी हो जाती है. अपनी मनोकामना को चिट्ठी में लिखकर माता को चढ़ा देते हैं, इसके बाद मनोकामना पूरी हो जाती है. साथ ही भोग के रूप में मिर्ची भजिया लाकर चढ़ाते हैं, जिससे माता और भी प्रसन्न हो जाती हैं और खोया हुआ कोई भी सामान दो से तीन दिन के अंदर मिल जाता है.
भोग में चढ़ाया जाता है मिर्ची भजिया
माता को विशेष रूप से मिर्ची भजिया, प्याज भजिया, दही, जलेबी, पूड़ी और हलवे का भोग लगाया जाता है. यहां पर भक्त माता से अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए ज्योति कलश जलाते हैं, खासकर नवरात्रि में यह कलश नौ दिनों तक अखंड जलता रहता है. माता धूमावती की प्रतिमा एक बूढ़ी साधारण महिला के रूप में दिखाई देती है, जो देखने में अद्भुत लगती है. मध्यप्रदेश के दतिया के बाद इस तरह की प्रतिमा केवल बिलासपुर में ही स्थापित है. मंदिर परिसर में शिव और शक्ति की उपस्थिति भी मानी जाती है, इसलिए इसे शिव शक्ति मंदिर भी कहा जाता है. भक्तगण माता की प्रतिमा के दर्शन कर अपनी मनोकामना पूर्ण होने की प्रार्थना करते हैं.
भारत और चीन युद्ध के दौरान हुई मंदिर की स्थापना
मंदिर की स्थापना महागुरु के निर्देश पर सबसे पहले 1962 में दतिया, मध्यप्रदेश में भारत-चीन युद्ध के समय राष्ट्र की रक्षा के लिए की गई थी. बाद में, 2005 में बिलासपुर में पीतांबरा पीठ धूमावती माता के इस मंदिर की स्थापना की गई. इस मंदिर के महंत देवानंद जी महाराज के अनुसार, माता धूमावती सभी भक्तों के कष्टों को दूर करती हैं, खासकर तब, जब अन्य देवी-देवताओं के दरबार से निराश भक्त यहां आते हैं.
बता दें कि इस मंदिर की खासियत यह है कि यहां माता को चिट्ठी लिखने की परंपरा है. यह मान्यता है कि जो भी भक्त सच्चे दिल से माता के चरणों में चिट्ठी चढ़ाता है, उसकी मनोकामना तीन दिनों के भीतर पूरी हो जाती है. इस मंदिर का इतिहास भारत-चीन युद्ध से जुड़ा है, जब महागुरु ने माता का आवाहन कर तीन दिन के अनुष्ठान के बाद चीन को युद्ध में हार का सामना करना पड़ा था.


