कोरबा नगर निगम के अधिवक्ता अशोक पाल ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। इस्तीफे के पीछे की वजह बताते हुए उन्होंने साफ कहा कि बिना वेतन के कोई भी वकील काम नहीं कर सकता।
अशोक पाल ने कहा कि पिछली सरकार के दौरान, जब प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी, तब नगर निगम के अधिवक्ता को हर महीने लगभग 10 हजार रुपये मानदेय दिया जाता था। लेकिन वर्तमान में भाजपा सरकार के कार्यकाल में नगर निगम में अधिवक्ताओं की नियुक्ति बिना वेतन के की गई है, जो व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है।
उन्होंने स्पष्ट तौर पर कहा कि वकालत एक पेशेवर काम है और कोई भी अधिवक्ता बिना मानदेय के नियमित रूप से जिम्मेदारी नहीं निभा सकता। इसी कारण उन्होंने नगर निगम के वकील पद से इस्तीफा देने का निर्णय लिया।
अशोक पाल के इस इस्तीफे के बाद नगर निगम की कार्यप्रणाली और अधिवक्ताओं की नियुक्ति व्यवस्था पर भी सवाल उठने लगे हैं। राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में यह चर्चा तेज हो गई है कि यदि अधिवक्ताओं को मानदेय ही नहीं मिलेगा तो नगर निगम के कानूनी मामलों को प्रभावी तरीके से कैसे संचालित किया जाएगा।
उनके इस्तीफे को लेकर अब नगर निगम और राजनीतिक गलियारों में बहस छिड़ गई है। कई लोग इसे व्यवस्था की खामी बता रहे हैं, तो वहीं यह मुद्दा नगर निगम की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े कर रहा है।
बुरा ना मानो होली है


