स्वर्गीय पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के चर्चित नारे की फिर हुई चर्चा, विधायकों और अफसरों को रियायती दर पर सरकारी भूखंड देने की नीति पर उठे सवाल।
रायपुर। छत्तीसगढ़ की राजनीति में स्वर्गीय पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी का दिया गया नारा “अमीर धरती के गरीब लोग” आज भी अक्सर चर्चाओं में सुनाई देता है। इस नारे के जरिए जोगी ने राज्य की प्राकृतिक संपदा और आम लोगों की आर्थिक स्थिति के बीच मौजूद विरोधाभास को उजागर करने की कोशिश की थी।
अब इसी नारे को आधार बनाकर सरकारी जमीन आवंटन की नीति पर सवाल उठाए जा रहे हैं। राजनीतिक और सामाजिक हलकों में तंज कसते हुए कहा जा रहा है कि अब यह नारा “अमीर धरती के गरीब विधायक, गरीब अफसर” में बदल गया है। सवाल यह है कि यदि हर विधानसभा क्षेत्र के विधायक और वरिष्ठ अधिकारियों को रियायती दर पर सरकारी जमीन उपलब्ध कराई जाती है, तो इसकी आवश्यकता, पारदर्शिता और औचित्य क्या है?
आलोचकों का कहना है कि सरकार की ओर से आवास निर्माण के उद्देश्य से दिए गए कई भूखंडों पर वर्षों तक मकान नहीं बने, जबकि कुछ मामलों में उन्हें बाद में ऊंची कीमत पर बेच दिया गया। इससे यह सवाल भी उठ रहा है कि यदि जमीन वास्तव में आवास की जरूरत पूरी करने के लिए दी गई थी, तो उसका व्यावसायिक उपयोग या बिक्री क्यों हुई?
हालांकि, यह भी सच है कि कई जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों ने इन भूखंडों पर मकान बनाकर निवास किया है। वहीं, कुछ अधिकारी सेवानिवृत्ति या स्थानांतरण के कारण राज्य से बाहर चले गए, जिनके मामले अलग हो सकते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार को ऐसी नीति बनानी चाहिए, जिससे रियायती दर पर आवंटित सरकारी जमीन केवल वास्तविक आवासीय जरूरत के लिए ही उपयोग हो। यदि निर्धारित समय में निर्माण न हो या भूखंड का व्यावसायिक लाभ उठाया जाए, तो उसकी स्पष्ट जवाबदेही तय की जाए।
इस पूरे मुद्दे ने एक बार फिर अजीत जोगी के उस चर्चित नारे को राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है, जो छत्तीसगढ़ की पहचान और संसाधनों के न्यायसंगत उपयोग की चर्चा में आज भी प्रासंगिक माना जाता है।



