कोरबा नगर निगम में एक नाम पट्टिका हटने के साथ ही
भाजपा के भीतर चल रही अंदरूनी खींचतान एक बार फिर चर्चा में आ गई है।
साकेतनगर वार्ड में पूर्व पार्षद विकास अग्रवाल और उनकी पत्नी आरती अग्रवाल के नाम से लगी पट्टिका हटाए जाने को लेकर अब इसे सिर्फ प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि राजनीतिक बदले की कार्रवाई के तौर पर देखा जा रहा है।
नगर निगम में वर्तमान में भाजपा की महापौर पदस्थ हैं,
लेकिन इसके बावजूद पार्टी के ही पुराने और प्रभावशाली चेहरों से जुड़े
नामों को इस तरह हटाया जाना
यह संकेत दे रहा है कि
कोरबा भाजपा एक नहीं, कई गुटों में बटी हुई नजर आ रही है।
विकास अग्रवाल और आरती अग्रवाल ने
दो-दो कार्यकाल में साकेतनगर वार्ड की तस्वीर बदलने का काम किया।
सड़क, नाली, बुनियादी सुविधाएं और जनसरोकार—
इन सबके चलते आज भी क्षेत्र में उन्हें
“पूर्व पार्षद” नहीं,
काम करने वाले जनप्रतिनिधि के रूप में याद किया जाता है।
खुद विकास अग्रवाल ने बेहद संयमित प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि
“बोर्ड निगम ने लगाया था, निगम हटा रहा है।
अब हम जनप्रतिनिधि नहीं हैं, शायद यही वजह हो।”
लेकिन राजनीति जानने वाले इसे
सिर्फ वजह नहीं, बहाना मान रहे हैं।
कार्यकर्ताओं के बीच सवाल उठ रहा है कि
क्या अब कोरबा भाजपा में
काम के आधार पर नहीं, गुट के आधार पर पहचान तय होगी?
क्या पुराने कार्यकर्ताओं और नेताओं की पहचान
इसलिए मिटाई जा रही है
क्योंकि वे किसी खास खेमे में फिट नहीं बैठते?
लोग साफ कह रहे हैं—
पट्टिका हटाई जा सकती है,
लेकिन काम से बनी पहचान नहीं।
और यही वजह है कि यह मामला
नगर निगम से ज्यादा
भाजपा की अंदरूनी राजनीति का आईना बन गया है।
साकेतनगर में आज चर्चा यह नहीं है कि
बोर्ड क्यों हटा,
बल्कि यह है कि
क्या कोरबा भाजपा में अब “अपनों” और “दूसरों” की राजनीति खुलकर सामने आ चुकी है?

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