कोरबा। भाजपा सरकार ने आखिरकार करीब ढाई साल बाद कोरबा नगर निगम के एल्डरमैनों की नियुक्ति कर दी। सूची जारी होते ही बधाइयों का दौर शुरू हुआ, लेकिन शहर के राजनीतिक गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा उन चेहरों की रही, जिनके नाम वर्षों से सिर्फ चर्चाओं में थे।

एल्डरमैन नियुक्ति में हुई देरी के दौरान शहर में रोज नए-नए राजनीतिक समीकरण बनते रहे। कोई खुद को बड़े नेता का करीबी बताता था, तो कोई अपनी नियुक्ति को केवल औपचारिकता बताता था। कोई अपने आप को महापौर का खास बताता रहा तो कोई मंत्री लाख लाल देवांगन का करीबी होने का दावा करता रहा। चाय की दुकानों से लेकर राजनीतिक बैठकों तक कई नाम लगभग “पक्के” बताए जाते रहे।

लेकिन जैसे ही अधिकृत सूची सामने आई, राजनीति का पूरा गणित बदल गया। जिन नामों को लेकर सबसे ज्यादा दावे किए जा रहे थे, उनमें से कई सूची में दिखाई ही नहीं दिए। अब शहर में लोग मुस्कुराते हुए कह रहे हैं—राजनीति में दावा करना आसान है, लेकिन आदेश की फाइल पर मुहर लगना अलग बात है।”

ढाई साल तक चली अटकलों का अंत आखिरकार एक सूची ने कर दिया। इस नियुक्ति ने फिर साबित कर दिया कि राजनीति में चर्चा, दावे और हकीकत—तीनों हमेशा एक जैसे नहीं होते।

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