कोरबा की सियासत में इन दिनों एक ऐसा नाम उभरकर सामने आया है, जिसे रणनीति का ‘चाणक्य’ कहा जा रहा है—नरेंद्र देवांगन। शांत स्वभाव, सटीक योजना और मजबूत संगठन क्षमता के दम पर उन्होंने हर चुनाव को जीत की कहानी में बदल दिया है।
नरेंद्र देवांगन ने अपने राजनीतिक सफर की सबसे बड़ी परीक्षा तब दी, जब उन्होंने अपने बड़े भाई और प्रदेश के मंत्री लखन लाल देवांगन के विधानसभा चुनाव की कमान संभाली। सूझबूझ भरी रणनीति, बूथ स्तर तक पकड़ और कार्यकर्ताओं की मजबूत फौज के साथ उन्होंने जीत का ऐसा चक्रव्यूह रचा कि विपक्ष देखते ही रह गया।
इसके बाद खुद मैदान में उतरकर निर्विरोध पार्षद बनना उनकी लोकप्रियता और प्रभाव का प्रमाण बना। यह केवल जीत नहीं, बल्कि क्षेत्र में उनकी मजबूत पकड़ और विश्वास का प्रतीक था।
कोरबा महापौर संजू सिंह राजपूत के चुनाव में भी नरेंद्र देवांगन ने चुनाव संचालक की भूमिका निभाई। उनकी रणनीति ने ऐसा असर दिखाया कि महापौर को करीब 50 हजार वोटों के भारी अंतर से जीत मिली—जो अपने आप में एक राजनीतिक रिकॉर्ड बन गया।
नरेंद्र देवांगन की खासियत यह है कि वे बिना शोर किए, चुपचाप अपनी रणनीति को जमीन पर उतारते हैं। हर वार सटीक और हर कदम सोच-समझकर उठाया जाता है। यही वजह है कि उनके साथ जुड़ने वाले कार्यकर्ता भी पूरी निष्ठा के साथ मैदान में उतरते हैं।
राजनीतिक गलियारों में अब यह चर्चा आम है कि जहां नरेंद्र देवांगन की रणनीति होती है, वहां जीत तय मानी जाती है। आने वाले समय में उन्हें कोरबा की राजनीति का बड़ा चेहरा माना जा रहा है।
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