कोरबा। अशोक वाटिका गार्डन में शुल्क लगाने की खबर ने नगर में ऐसा हड़कंप मचाया है मानो गार्डन में गुलाब नहीं, कांटे उग आए हों। जनता का गुस्सा सातवें आसमान पर है—कह रही है “सैर-सपाटा अब महंगा पड़ रहा है”।

लेकिन असली ट्विस्ट तो यह है कि जिस अग्रवाल जी ने नगर निगम से ठेका लिया है, उनकी भी नींद उड़ चुकी है। सोचिए, जनता नाराज और ठेकेदार भी परेशान—मतलब “सौदा ऐसा कि घाटा ही घाटा”।

अग्रवाल जी ने तो बड़े सपनों के साथ यह डील ली थी—पिकनिक, शादी-ब्याह, प्रोग्राम… सबकी प्लानिंग थी। पर जनता का मूड बिगड़ गया और गार्डन में भीड़ घट गई। अब हालत यह है कि शुल्क का फैसला बन गया सिरदर्द और चर्चा का मसाला।

जनता पूछ रही है—“भाई साहब! यह गार्डन है या पांच सितारा होटल?”
और ठेकेदार कह रहे हैं—“ना जनता खुश, ना हम… निगम वालों ने तो बीच में फंसा दिया।”

कुल मिलाकर, अशोक वाटिका फिलहाल हरा-भरा कम, और ‘गर्मागरम चर्चा’ ज्यादा हो गया है।

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