शेख हसीना के इस्तीफा देने और भारत आने के बाद बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ हिंसा का जैसा नंगा नाच देखने को मिला वह किसी का भी दिल दहला देने वाला था. उनके पूजा स्थल तोड़े गए. इस्कॉन मंदिर भी नष्ट कर दिया गया और अंतरिम सरकार सोती रही

पिछले 4 अगस्त से लगातार बांग्लादेश में हिंदुओं के घर और मंदिर फूंके गए. मंदिर तोड़े गए और हिंदुओं को मारा गया. एक हफ़्ते से ऊपर हो चुके हैं तब जाकर बांग्ला देश की अंतरिम सरकार की नींद खुली और उन्होंने हिंदुओं से माफ़ी मांगी है. अंतरिम सरकार में गृह मंत्रालय के सलाहकार रिटायर्ड ब्रिगेडियर जनरल सखावत हुसैन ने कहा है, हम हिंदू समुदाय की रक्षा करने में सफल रहे. हम हिंदू समुदाय से माफ़ी मांगते हैं.

 

सवाल यह उठता है बांग्लादेश के हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यक समुदाय को रक्षा प्रदान के लिए अंतरिम सरकार ने लेट-लतीफ़ी क्यों की? जबकि यह तो प्रधानमंत्री शेख हसीना के इस्तीफे देने और देश छोड़ने के साथ ही लग रहा था कि हिंदू अब वहां सुरक्षित नहीं हैं. सबको पता था कि हसीना सरकार के खिलाफ आंदोलन कर रहे छात्रों के बीच आतंकी तत्त्व घुसे हुए हैं. इन तत्त्वों के निशाने पर हिंदू समुदाय रहता है.

हसीना के भाई-भतीजावाद से लोगों में गुस्सा

शेख हसीना वाज़ेद को हिंदुओं का हितैषी माना जाता था. इसलिए कट्टरपंथी तत्त्व उन्हें क़तई पसंद नहीं करते थे. इसकी एक वजह तो यह थी कि शेख हसीना या उनके पिता शेख मुजीबुर्रहमान पर जब भी कोई संकट आया, भारत ने उनकी मदद की. यूं भी बांग्लादेश पाकिस्तान से स्वतंत्र राष्ट्र भारत की मदद से बना था. इसलिए भी पाकिस्तान परस्त कट्टरपंथी उनसे सख़्त नफरत करते रहे. और इसी वजह से वे हिंदुओं से भी चिढ़ते थे.

 

इसमें कोई शक नहीं कि शेख हसीना ने अपने राज में ज़म कर भाई-भतीजावाद चलाया और उन पर भ्रष्टाचार के आरोप भी खूब लगे. इसलिए बांग्लादेश की अधिकांश जनता उनसे रुष्ट थी. यह अलग बात है कि उनके राज में बांग्ला देश का निर्यात बढ़ा. दुनिया भर में बांग्ला देश में बने कपड़ों की मांग खूब बढ़ी. परंतु इस निर्यात का लाभ सिर्फ उनके रिश्ते-नातोंदारों को ही मिला. बांग्लादेश के मजदूरों को उतना वेतन नहीं दिया गया, जो अंतर्राष्ट्रीय माणकों के अनुरूप होता.

छात्रों के हाथ से कमान निकल गई

यह नाराजगी ही छात्र आंदोलन के रूप में फूटी. इसका लाभ उन तत्त्वों ने भी उठा लिया जो पाकिस्तान के मोहरे थे. इसके अलावा ख़ालिदा ज़िया की बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के लोग भी इस आंदोलन में शामिल हो गए. इन दोनों के निशाने पर हिंदू थे. पाकिस्तानपरस्त लोगों के तो दिमाग में हिंदुओं के प्रति जहर भरा हुआ है. BNP के लोग शेख हसीना पार्टी अवामी लीग का वोट बैंक कम करना चाहते हैं. वहां के हिंदुओं का समर्थन और वोट अवामी लीग को मिलता है. इसीलिए हिंदुओं के विरुद्ध हिंसा का जैसा नंगा नाच वहां चला, वह दिल दहला देने वाला था. उनके पूजा स्थल तोड़े गए. इस्कॉन मंदिर को तो नष्ट ही कर दिया गया. कई हिंदू स्त्री-पुरुष मारे गए और तब तक अंतरिम सरकार सोती रही. शेख हसीना के इस्तीफ़ और देश छोड़ने के बाद जनरल वकार ने खालिदा जिया की रिहाई के आदेश तो फ़ौरन दिए लेकिन हिंदुओं की रक्षा के लिए सुरक्षाकर्मी तैनात नहीं किए

विरोध प्रदर्शनों के बाद यूनुस सरकार चेती

यहां तक कि इस अंतरिम सरकार के मुखिया मोहम्मद यूनुस ने भी हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यक समुदाय की रक्षा के लिए कोई भी कारगर कदम नहीं उठाए. उलटे बांग्लादेश का मीडिया यह बताने में लगा रहा कि ढाका यूनिवर्सिटी के छात्र हिंदुओं की रक्षा में लगे हुए हैं. यह एक तरह से सरकार द्वारा हालात के प्रति आंखें मूंद लेना था. राजधानी के बाहर हिंदू घरों को फूंका जाता रहा तथा मंदिरों में तोड़-फोड़ भी होती रही.

जब वहां के हिंदुओं ने खुद मोर्चा साधा और ढाका से लेकर विदेशों में बसे बांग्ला देशी हिंदुओं ने प्रदर्शन करने शुरू किए तब यूनुस सरकार ने उनके आंसू पोछने के लिए माफ़ी माँगने जैसा दिखावा किया. भारत के अलावा अमेरिका में भी बांग्लादेश के हिंदुओं पर अत्याचार की खबरें आईं. शेख हसीना ने तो छह अगस्त को इस्तीफा दिया था परंतु हिंदुओं के खिलाफ हिंसा तो वहाँ दो दिन पहले से ही शुरू हो गया था.

हिंदुओं के साथ ऐसी नृशंसता कभी नहीं हुई

जाहिर है कि उस समय ही आंदोलनकारी छात्रों की भीड़ में शामिल एक बड़ा वर्ग ही यह हिंसा कर रहा था, किंतु किसी ने भी यह हिंसा बंद करने की न अपील की न हिंदुओं की रक्षा के लिए खुद छात्र सन्नद्ध हुए. अगर बांग्लादेशी हिंदुओं की बात सुनी जाए तो ऐसी हिंसा तो उनके साथ पाकिस्तान के शासन के वक्त भी नहीं हुई थी. न तब जब शेख़ मुजीब का तख्ता पलट हुआ था या जनरल जियाऊर्रहमान ने यहां की कमान संभाली थी. न एरशाद के समय और न ही 2001 में तब जब ख़ालिदा जिया सत्ता में आईं.

यहां तक कि 1992 में जब अयोध्या बाबरी मस्जिद का ध्वंस हुआ था, तब पाकिस्तान में अनगिनत हिंदू घरों को जलाया गया और मंदिर तोड़े गए. हिंसा तब भी बांग्लादेश में हुई थी. लेकिन वहां के हिंदू बताते हैं कि इस बार जो नृशंसता हुई है वैसा पहली कभी नहीं हुई. बंटवारे के समय कोई 22 प्रतिशत पूर्वी पाकिस्तान में थे. जो अब 8 प्रतिशत बचे हैं.

 

यूनुस सरकार का दिखावा

2024 की हिंसा ने तो पश्चिमी पाकिस्तान में आबाद हिंदुओं के साथ हो रहे अत्याचारों को भी पीछे छोड़ दिया है. पाकिस्तान की खबरें जल्दी मीडिया में आ जाती हैं. और फ़ौरन एमनेस्टी इंटरनेशनल सक्रिय हो जाता है. इससे पाकिस्तान की सरकार दुबक जाती है. बांग्लादेश में 4 अगस्त से लगातार हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया जा रहा है पर अंतरिम सरकार के मुखिया नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस मौन रहे. लेकिन जब हिंदुओं ने काउंटर किया तब यूनुस सरकार के कान खड़े हुए. अब वे हिंदू प्रतिनिधियों के साथ मीटिंग करेंगे.

मगर इस देरी से यह बात तो साफ ही हो गई कि यूनुस सरकार के ये दिखाने के दांत हैं, ताकि पूरी दुनिया में यह संदेश जाए कि नहीं, बांग्ला देश की अंतरिम सरकार अपने देश के हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों के प्रति संवेदनशील हैं. इसीलिए अब जाकर माफ़ी माँगने का उन्होंने दिखावा किया है.

ईस्ट बंगाल हिंदुओं का गढ़ शुरू से रहा

संयुक्त राष्ट्र के मुख्यालय और अमेरिका के ह्यूस्टन शहर में हिंदुओं ने ज़बर्दस्त प्रदर्शन किए, इससे मोहम्मद यूनुस सरकार सतर्क हुई और 11 अगस्त को माफी मांगी गई. बताते चलें कि मोहम्मद यूनुस प्रधानमंत्री शेख हसीना वाज़ेद के घोर विरोधी रहे हैं. इसलिए हिंदुओं को संदेह है कि हो सकता है इसीलिए हिंदुओं के असुरक्षा बोध पर यूनुस सरकार के लोगों ने चुप साध रखी हो. 1905 के बंग भंग के पहले तक ईस्ट बंगाल में हिंदुओं की आबादी बहुत अधिक थी. मुगलों के समय तक सूबा-ए-बंगाल के नवाब मुर्शिदाबाद (पश्चिमी बंगाल) और उसके आस-पास ही बसते थे. हिंदू तब व्यापारी थे या छोटे-मोटे जागीरदार अथवा कमकर वर्ग.

ईस्ट इंडिया कंपनी ने जब बंगाल की दीवानी अपने हाथों में ली तो सारी बड़ी जमींदारियां ईस्ट बंगाल में हिंदुओं को दीं. नई बंदोबस्त प्रणाली से इतनी अधिक आय थी कि इन ज़मींदारों ने कलकत्ता में अपनी राजबाड़ियां बनाईं. आज वे राजबाड़ी सूनी पड़ी हैं. उनके मौजूदा वारिस उनकी साफ़-सफ़ाई भी नहीं करवा पाते.

यहां के बंगाल पर ईस्ट बंगाल हावी

आज भी भारतीय बंगाल के आधुनिक नेता सभी के परखे कभी आज के बांग्ला देश से आए थे. ज्योति वसु, बुद्धदेब भट्टाचार्य आदि सभी नेता अपनी जड़ें पूर्वी बंगाल से बताते थे. पश्चिम बंगाल के इन भद्र लोक हिंदू नेताओं को पूर्वी बंगाल से इतना अनुराग था कि उन्होंने अपनी फ़ुटबाल टीम का नाम ईस्ट बंगाल रखा. पता होना चाहिए कि फ़ुटबाल के प्रति बंगालियों में ज़बर्दस्त आकर्षण होता है. इसलिए पूर्वी बंगाल से इधर आए बंगालियों की टीम को ईस्ट बंगाल फ़ुटबाल क्लब कहा गया और यहाँ के बंगाल की टीम मोहन बाग़ान फ़ुटबाल क्लब के नाम से जानी जाती है.

 

Share.

About Us

हमारी यह समाचार पोर्टल वेबसाइट नवीनतम ख़बरों, विस्तृत विश्लेषण और सामयिक घटनाओं की सटीक जानकारी प्रदान करती है। कन्हैया सोनी द्वारा स्थापित और संपादित, हम निष्पक्ष और विश्वसनीय समाचारों के प्रति समर्पित हैं।

Contact Us

 Editor: कन्हैया सोनी

Contact No.: +91 89596 82168
Email : kaniyason2521@gmail.com

Follow For More

© 2025 Soni Narad Muni News. All Rights Reserved. Developed by Nimble Technology

Exit mobile version