पूर्व केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी लोकसभा चुनावों के बाद फिर चर्चा में हैं लेकिन इस बार चर्चा की वजह राजनीति या राहुल गांधी पर कोई तीखी टिप्पणी नहीं, बल्कि राजनीति छोड़ने की अटकलें हैं. गौरतलब है कि स्मृति ईरानी छोटे पर्दे पर अपने टीवी शो ‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी’ के दूसरे सीजन के साथ वापसी करने जा रही हैं. राजनीतिक पंडितों का अनुमान है कि एक्टिंग में वापसी के बाद स्मृति ईरानी एक्टिव पॉलिटिक्स को गोविंदा और धर्मेंद्र की तरह अलविदा कह सकती हैं. हालांकि, स्मृति का कहना है कि मैं फुल-टाइम राजनेता हूं और पार्ट-टाइम एक्ट्रेस. यह सिर्फ एक साइड-प्रोजेक्ट है, जैसे कई नेता पार्ट-टाइम लॉयर या जर्नलिस्ट होते हैं. आइए इस रिपोर्ट में जानने की कोशिश करते हैं कि क्‍या वाकई इसमें सच्चाई है या कुछ और.. आने वाले समय में बीजेपी में स्मृति ईरानी की भूमिका क्या हो सकती है?

हालांकि, राजनीति का गणित उतना सीधा नहीं होता जितना दिखता है और बीजेपी में तो बात और भी रहस्यमयी हो जाती है. स्मृति ईरानी बार-बार राजनीति छोड़ने की अटकलों को सिरे से खारिज कर रही हैं, लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में अमेठी में हार के बाद उनकी सक्रियता एकदम घटी है. 2014 में स्मृति ईरानी को बीजेपी ने पहली बार राहुल गांधी के खिलाफ चुनाव लड़ने के लिए अमेठी भेजा था. हालांकि राहुल से वह करीब एक लाख वोट से हार गईं. लेकिन हार के बाद भी स्मृति ने अमेठी को नहीं छोड़ा. 2019 के चुनाव में इसका असर दिखा और स्मृति ने गांधी परिवार के गढ़ रहे अमेठी में राहुल गांधी को हराया.. लेकिन 2024 के चुनाव में समीकरण बदल गए और अमेठी में स्मृति ईरानी को किशोरीलाल शर्मा के सामने करारी हार का सामना करना पड़ा. इस हार के बाद स्मृति ईरानी के सितारे भी गर्दिश में चले गए. हालत ये है कि जिस अमेठी में स्मृति ईरानी ने एक बड़ा सा घर बनवाया था, 2014 में करारी हार के बाद भी डटी रही, उसी अमेठी से अब वो दूर हैं. लोकसभा चुनाव में हार के बाद वो मात्र 1 बार अमेठी आई थीं, वो भी 355 दिन बाद. आइए अब 3 कारणों से समझते हैं कि जैसा अटकलें कहती हैं स्मृति ईरानी क्यों राजनीति छोड़ सकती हैं?

अमेठी से वापसी की धूमिल उम्मीदें
यूपी में अमेठी और रायबरेली कांग्रेस का गढ़ रहा है. जहां पार्टी का उम्मीदवार कोई भी हो, जनता को कोई बहुत ज्यादा फर्क नहीं पड़ता. अगर 2 अपवादों को छोड़ दें तो हर बार इन सीटों में लगातार गांधी परिवार को जीत मिलती रही है. 1977 के चुनाव में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को रायबरेली में समाजवादी नेता राजनारायण ने हराया था. वहीं 2019 में अमेठी में स्मृति ईरानी के सामने राहुल गांधी को हार का स्वाद चखना पड़ा था. बाद में कांग्रेस ने फिर वापसी की और अपना किला बचाए रखा. ऐसे में यह उम्मीद करना कि 2029 में अमेठी में फिर कोई चमत्कार होगा, यह थोड़ा मुश्किल है. यानी अमेठी से स्मृति ईरानी फिर से सांसद बन जाएं, यह थोड़ा मुश्किल है. हालांकि राजनीति में कुछ भी संभव है.

मोदी मंत्रिमंडल का ट्रेंड और इतिहास
अमेठी से हार के बाद जहां स्मृति ईरानी को एक बड़ा झटका लगा था, वहीं 10 साल बाद उन्हें मंत्रिमंडल में भी जगह नहीं मिली. अगर आंकड़ों पर गौर करें तो 2019 में जब नरेंद्र मोदी दूसरी बार पीएम बने थे तो पिछली सरकार के 37 मंत्रियों को मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किया गया था. इसमें कई बड़े नाम भी शामिल थे. वहीं यह ट्रेंड 2024 में भी जारी रहा, जब नरेंद्र मोदी ने देश के प्रधानमंत्री के रूप में तीसरी बार शपथ ग्रहण की और इसके साथ ही मोदी 3.0 में 71 मंत्रियों को भी शपथ दिलाई गई. पर, मोदी 2.0 के 34 ऐसे मंत्री थे, जिनको इस बार मंत्रिमंडल में जगह नहीं दी गई. सबसे गौर करने वाली बात ये है कि जिन 71 नेताओं को मंत्रिमंडल से बाहर किया गया, उनकी दोबारा पार्टी या सरकार में वापसी नहीं हुई. हालांकि जेपी नड्डा, वी के सिंह और अनुप्रिया पटेल इसके अपवाद जरूर हैं. अगर बीजेपी का यह सियासी ट्रेंड जारी रहता है तो स्मृति ईरानी की वापसी मुश्किल लगती है.

टूटा राज्यसभा का सपना
आमतौर पर पार्टी का जब कोई बड़ा नेता चुनाव हार जाता है तो उसे राज्यसभा के रास्ते संसद में भेज दिया जाता है. स्मृति ईरानी को भी कहीं न कहीं यह आशा जरूर रही होगी कि उनको राज्यसभा भेजा जाए. स्मृति ईरानी का जुड़ाव 3 राज्यों यानी दिल्ली, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र से है. दिल्ली जहां उनका जन्म हुआ और पहला चुनाव लड़ा, महाराष्ट्र जो उनकी कर्मभूमि रही और यूपी जहां से वो सांसद निर्वाचित हुईं. तीनों राज्यों में बीजेपी की सरकार है, लेकिन उनका सपना अधूरा रह गया.

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