अजीत प्रमोद कुमार जोगी… छत्तीसगढ़ की राजनीति की एक ऐसी शख्सियत जिसका नाम बड़े अदब से लिया जाता है। लेक्चरर,आईपीएस, आईएएस,विधायक,सांसद,राज्यसभा सांसद…ये वो पद हैं जो अजीत जोगी को एक काबिल व्यक्ति बनाते हैं। छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री जिसके इर्द-गिर्द छत्तीसगढ़ की राजनीति घूमती रही। जोगी हमेशा चर्चा में रहते। उनके बेबाक बोल उन्हें दूसरे नेताओं से अलग बनाते थे। जन सभाओं में जोगी को सुनने हुजूम उमड़ पड़ता था। ठेठ छत्तीसगढ़ी में जोगी अपनी सभा को संचालन करते थे। प्रशासनिक और राजनीतिक धुरंधर होने के साथ शब्दों के महान जादूगर भी थे। तो आज हमार छत्तीसगढ़ के इस अंक में बात अजीत जोगी की।

जन्म,पढ़ाई और प्रशासनिक अधिकारी

अजीत जोगी का जन्म 29 अप्रैल 1946 को बिलासपुर के पेंड्रा में हुआ था। स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद जोगी ने भोपाल के मौलाना आजाद कॉलेज ऑफ टेक्नोलॉजी से मकैनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और साल 1968 में यहां से गोल्ड मेडलिस्ट रहे। शिक्षा पूरी करने के बाद अजीत जोगी ने रायपुर के गवर्नमेंट इंजीनियरिंग कॉलेज में लेक्चरर के रूप में सेवाएं दीं। इसके बाद उनका चयन भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) के लिए हो गया। बाद में वह भारतीय प्रशासनिक सेवा यानि आईएएस के लिए भी चुन लिए गए। सीधी जिले में अपने पेशेवर काम के दौरान उनका परिचय मध्य प्रदेश के एक प्रमुख राजनेता अर्जुन सिंह से हुआ,जो बाद में राजनीति में उनके गुरु बन गए।

CM अर्जुन सिंह के खास अफसरों में थे जोगी

जब ​​अर्जुन सिंह 1980 में मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने अजीत जोगी को रायपुर और बाद में इंदौर का कलेक्टर नियुक्त किया। अजीत जोगी को अर्जुन सिंह ने कई बार राजीव गांधी से मिलवाया। भारतीय प्रशासनिक सेवा के दौरान साल 1981 से 1985 तक अजीत जोगी इंदौर के डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर रहे। जोगी की गिनती अर्जुन सिंह के चहेते अधिकारियों में होती थी,लेकिन जोगी के राजनीतिक जीवन की शुरुआत पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के संपर्क में आने के बाद हुई। 1986 से 87 के बीच अजीत जोगी को अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी में अनुसूचित जाति/जनजाति कल्याण समिति की जिम्मेदारी दी गई। 1986 से लेकर 98 तक अजीत जोगी दो बार के राज्यसभा सदस्य रहे। 1998 में जोगी पहली बार रायगढ़ लोकसभा क्षेत्र से लिए चुने गए। इसी दौरान उन्हें कांग्रेस पार्टी ने राष्ट्रीय प्रवक्ता की जिम्मेदारी भी सौंपी गई थी।

 

पायलट रहने के दौरान राजीव गांधी से मिलने एयरपोर्ट जाते

राजनीतिक से जुड़े लोग बताते हैं कि कलेक्टर रहते हुए अजीत जोगी ने पूर्व प्रधानमंत्री और पायलट रहे राजीव गांधी से उनके जो रिश्ते बने,वही उन्हें राजनीति में लाने में मददगार बने। कलेक्टर अजीत जोगी की रायपुर में पोस्टिंग थी,उन दिनों राजीव गांधी पायलट हुआ करते थे और एयर इंडिया की प्लेन उड़ाते थे। कलेक्टर अजीत जोगी ने अधिकारियों को सख्‍त निर्देश दिया था कि,जब भी राजीव गांधी की फ्लाइट रायपुर आए उन्हें बताया जाए। जब राजीव की फ्लाइट रायपुर पहुंचती तो जोगी घर से चाय-नाश्ता लेकर उनसे मिलने जाते। इस तरह जोगी-राजीव गांधी की नजर में आए और थोड़े ही समय में वो राजीव गांधी के करीबी बन गए। बाद में कलेक्टरी के दौरान ही भारतीय प्रशासनिक सेवा की नौकरी छोड़कर वे राज्यसभा सांसद के रूप में राजनीति से जुड़ गए।

एक फोन ने कलेक्टर से राजनेता बना दिया

साल 1985 में जब इंदौर कलेक्टर अजीत जोगी अपने बंगले में सो रहे थे। इस दौरान उनके बंगले का फोन बजा। फोन उनके एक कर्मचारी ने उठाया और कहा कि कलेक्टर साहब तो सो रहे हैं। सामने से एक आवाज आई और उन्होंने आदेश भरे स्वर में कहा कि कलेक्टर साहब को उठाइए और बात करवाई। साहब जगाए जाते हैं,फोन पर आते हैं। अजीत जोगी ने जैसे ही फोन पर हैलो कहा,सामने से एक आवाज आई-तुम्हारे पास ढाई घंटे हैं। राजनीति में आना है या कलेक्टर ही रहना है? दिग्विजय सिंह आपको लेने आएंगे,उनको अपना फैसला बता देना। दरअसल फोन करने वाला वह शख्स कोई और नहीं बल्कि पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के पीए वी जॉर्ज थे। इसके ढाई घंटे बाद दिग्विजय सिंह अजीत जोगी के बंगले पर पहुंचे,तब तक अजीत जोगी एक कलेक्टर से कांग्रेस नेता अजीत जोगी बन चुके थे। कुछ ही दिन बाद उनको कांग्रेस की ऑल इंडिया कमिटी फॉर वेलफेयर ऑफ शेड्यूल्ड कास्ट एंड ट्राइब्स के मेंबर बना दिया गया। इसके बाद वो कुछ ही महीनों में राज्यसभा भेज दिए गए।

छत्तीसगढ़ राज्य बनते ही पहले CM बने

साल 2000 में छत्तीसगढ़ को अलग राज्य घोषित किया गया और अजीत जोगी राज्य के पहले मुख्यमंत्री बने। ये जिम्मेदारी जोगी ने साल 2003 तक संभाली। मुख्यमंत्री के कई लिए कांग्रेस के कई दिग्गजों के नाम चल रहे थे और अचानक अजीत जोगी के नाम के ऐलान ने राजनीतिक गलियारों में सबको चौंका दिया। 2003 में राज्य में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी हार गई और राज्य में पहली बार डॉ. रमन सिंह के नेतृत्व में बीजेपी की सरकार बनी। इन चुनावों में जोगी खुद मरवाही सीट से मैदान में थे और उन्होंने बीजेपी के नंद कुमार साय को 54 हजार से ज्यादा वोटों से हराया। इस चुनाव में कांग्रेस ने 37 सीटें जीती थी।

2004 में कांग्रेस की बचाई लाज

साल 2004 में हुए लोकसभा चुनाव में अजीत जोगी ने कांग्रेस की तरफ से छत्तीसगढ़ की महासमुंद सीट से चुनाव लड़ा। इस दौरान उनका मुकाबला कांग्रेस से भाजपा में शामिल हुए वरिष्ठ नेता विद्याचरण शुक्ल से था। जोगी ने विद्याचरण शुक्ल जैसे दिग्गज नेता को हराकर छत्तीसगढ़ की राजनीति में अपना कद सबसे ऊपर कर लिया। इन चुनावों में केंद्र में कांग्रेस गठबंधन की सरकार बनी,लेकिन अजीत जोगी को सरकार में कोई बड़ी जिम्मेदारी नहीं दी गई। 2004 में जोगी ने छत्तीसगढ़ कांग्रेस की लाज भी बजाई थी। महासमुंद सीट को जीतकर जोगी ने कांग्रेस पार्टी की छत्तीसगढ़ में लाज बचाई थी। बाकी 10 सीटें भाजपा ने जीती थी।

जोगी के इर्द-गिर्द रही छत्तीसगढ़ की राजनीति

साल 2008 में छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव में जोगी एक बार फिर मरवाही से मैदान में उतरे। इस बार भी राज्य में कांग्रेस की हार हुई,लेकिन अजीत जोगी ने बंपर वोटों से चुनाव जीता। अजीत जोगी ने बीजेपी के ध्यान सिंह पोर्ते को 42 से ज्यादा हराया था। इसके बाद साल 2009 में हुए लोकसभा चुनाव में जोगी मैदान में नहीं उतरे। छत्तीसगढ़ बनने के बाद ऐसा पहली बार हुआ जब अजीत जोगी ने विधानसभा का अपना कार्यकाल पूरा किया। 2013 में हुए छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव में अजीत जोगी मरवाही विधानसभा सीट से अपने बेटे अमित जोगी को मैदान में उतारा। अमित जोगी ने बीजेपी समीरा पैकरा को 46 से ज्यादा वोटों से हराया था। इसके बाद साल 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में अजीत जोगी ने महासमुंद लोकसभा सीट से एक बार फिर ताल ठोकी, लेकिन इस बार जोगी मोदी हवा में भारतीय जनता पार्टी के चंदूलाल साहू से 1217 वोटों से हार गए। इस चुनाव में चंदूलाल नाम के 11 प्रत्याशी भी चुनाव में खड़े थे।

जोगी और उनकी पत्नी ने जीता चुनाव

2018 विधानसभा चुनाव में राज्य के पहले मुख्यमंत्री अजीत जोगी पहली बार कांग्रेस पार्टी से अलग चुनाव लड़े। अजीत जोगी अपनी अलग पार्टी जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ (JCC-J) के साथ मैदान में उतरे थे। राज्य की 90 सीटों में जोगी की पार्टी 55 सीटों पर चुनाव लड़ी,बाकि 35 सीटों पर जेसीसीजे ने बीएसपी को समर्थन किया है। अजीत जोगी खुद मरवाही सीट से चुनाव लड़े और जीते थे। वहीं कोटा विधानसभा सीट से उनकी पत्नी रेणु जोगी भी चुनाव जीती थीं। बहू ऋचा जोगी अकलतरा सीट से बीएसपी के टिकट पर मैदान में उतरीं थी और बहुत कम अंतर से हारीं थी। 90 में से 60 सीटों पर बीएसपी-जेसीसी गठबंधन ने 7 सीटें जीती थी,जिनमें से 5 सीटें अजीत जोगी की पार्टी जेसीसीजे ने जीती थी। वहीं 2 सीटों पर बीएसपी (बहुजन समाज पार्टी) ने जीत दर्ज की थी।

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